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गज़ल

ग़ज़ल — हरेराम सिंह सीने में ग़म लिए हम मुस्कुरा नहीं सके, तेरे बिना जहाँ में चैन पा नहीं सके। जिसको भी अपना समझा, वही बदल गया, हम अपने दर्द का किस्सा सुना नहीं सके। रिश्तों की भीड़ थी मगर सब अजनबी लगे, हम एक सच्चा आदमी बचा नहीं सके। वह ख़्वाब टूटकर धुएँ में यूँ बिखर गया, आँखों में फिर कोई सपना सजा नहीं सके। हर मोड़ पर उम्मीद ने आवाज़ तो दी, लेकिन कदम थके थे, आगे बढ़ा नहीं सके। तस्वीर, ख़त, किताबें सब बोलती रहीं, हम अपने दिल को फिर भी बहला नहीं सके। तक़दीर से लड़ाई में उम्र कट गई, हम अपनी हार का कारण बता नहीं सके। अब भी कहीं से लौट के आ जाएँ वो अगर, हम इस दिल-ए-उदास को समझा नहीं सके। जीते रहे हैं फिर भी अधूरी-सी आस में, हम टूटकर भी खुद को मिटा नहीं सके।

सब टूट रहे हैं

सब टूट रहे हैं… — हरेराम सिंह सब टूट रहे हैं— पेड़ों की शाखों की तरह नहीं, भीतर की निस्तब्धता की तरह; जहाँ आवाज़ नहीं होती, केवल दरारें जन्म लेती हैं। समय धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर उतरता है और एक दिन उसके विश्वासों को रेत की तरह बिखेर देता है। टूटना भी विचित्र है— यह एक क्षण में नहीं होता। पहले उम्मीद टूटती है, फिर प्रतीक्षाएँ, फिर संबंधों का संगीत; और अंत में मनुष्य अपनी ही आँखों में अजनबी हो जाता है। इंसान मिट्टी से बना है— इसलिए हर ठोकर उसे उसकी नश्वरता का बोध कराती है। वह गिरता है, संभलता है, फिर गिरता है; मानो जीवन उसे बार-बार अपूर्ण होने का अर्थ सिखा रहा हो। कुछ मोड़ ऐसे आते हैं जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं। सब्र सूखी शाख की तरह चटकता है, विश्वास काँच की तरह बिखरता है, और रिश्ते धीरे-धीरे स्मृतियों में बदल जाते हैं। तब आदमी रोता भी नहीं— बस भीतर एक लंबी खामोशी लेकर जीता रहता है। शायद टूटना ही मनुष्य होने की सबसे सच्ची अवस्था है।

कुछ सवाल

मेरे कुछ सवाल - • स्त्री का सबसे बड़ा सुख क्या है ? • स्त्री का सबसे बड़ा दुःख क्या है ? • स्त्री किस स्थिति में सबसे प्रिय वस्तु/ रिश्ते को त्याग देती है ? • स्त्री कैसे पुरुष पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है ? • स्त्री के जीवन में पुरुष- प्रेम का क्या महत्व है ? • स्त्री की दृष्टि में पुरुष कब घृणा का पात्र बन जाता है ? • आधुनिक युग में स्त्री किस तरह के पुरुषों को पसंद करती हैं? • स्त्री की दृष्टि में ' ईमानदार पुरुष ' का क्या अर्थ है ? • स्त्रियों की दृष्टि में जीवन में ' सुख ' और ' सफलता' का क्या मायने हैं ?

सबक

लोग किसी भी रिश्ते की शुरुआत सुंदर कल्पनाओं से करते हैं और अपनी मूर्खताओं की वजह उसे बदसूरत बना देते हैं । कहाँ हमलोगों को खुशी के साथ, सम्मान के साथ और प्रेम के साथ एक दूसरे को समझते हुए जीना चाहिए था और कहाँ हम एक- दूसरे से शिकवा- शिकायत शुरू कर दिए । यहाँ तक कि बोलने बतियाने और कुछ उत्सव मनाने से कतराने लगे । छिः मूर्खता का हद है ! शरीर नहीं तो जीवन कैसा, उत्सव कैसा ? शरीर मन के उत्सव को साकार करने का माध्यम है । शरीर है तो कोई रिश्ता है- पति है, प्रेमी है या ब्यायफ्रेंड । पुरुष के लिए माँ, पत्नी, बेटी या कोई फ्रेंड या गर्लफ्रेंड । पवित्रता- अपवित्रता सब मन की उपज है।  

ग़ज़ल

सपने की हकीकत, बयां करते नहीं । टूट जाते हैं इक दिन, बयां करते नहीं ॥ जिन्हें देखा था कि वे हमदम हैं । वे हमदम नहीं, बयां करते नहीं ॥ हसीनों से दोस्ती न कर तू । वे बदल जाती हैं, बयां करती नहीं ॥ ख्वाबों की मल्लिका, ख्वाब ही रहती हैं । इस सच को कहीं, बयां करते नहीं ॥ आदमी है तो उम्मीद तो रक्खेगा ही | उम्मीदें टूट जाती हैं, बयां करते नहीं ॥ कहीं गफ़लत में जीने से अच्छा है । जी जिंदगी ऐसे ही, बयां करते नहीं ॥

हिसाब किताब

स्त्रियाँ कहती हैं- तुम जाओ । इतना बेवकूफ नहीं हो कि मेरी भाषा समझ नहीं रहे हो । वे गुस्सा करेंगी, चिड़चिड़ापन लिए रहेंगी, सामान्य बात को जोर से कहेंगी । मतलब तुम चले जाओ मेरी जिंदगी से यानी रिश्ता खत्म । लेकिन वे अपनी बात आपके मुँह से उगलवाएँगी । हर बार आपको घेरेंगी, गलत ठहराएँगी और आपको माफी के हद तक गिरा देंगी । क्योंकि वे प्रेम में हैं । उनकी अधिकांश जिंदगी इसी खेल में बीत जाता है । इसमें जीतना उन्हें सुकून देता है । इसमें अधिक बार पुरुष छले जाते हैं । और कई बार स्त्री भी । जहाँ आकर्षपण, शोहरत और पैसे की भूख है वहाँ स्त्री छली जाती है और जहां प्रेम रहता है, वहाँ पुरुष ।  पुरुषों की कमी है कि वह अपनी पसंद की स्त्री के साथ हर स्थिति में रहना चाहता है । कुछ स्त्रियां भी ऐसी हैं। किंतु सभी नहीं । बहुत कम स्त्रियां हैं जो अपने रिश्ते के साथ लंबे समय तक बनी रहती हैं । इस टिप्पणी पर स्त्रियों की टिप्पणी अपेक्षित है । उनकी टिप्पणी बिना यह टिप्पणी अधूरी है । जब वह सीधे कहती हैं तबतक बहुत समय निकल चुका रहता है । पुरुष पीछा रह जाता है और स्त्री आगे चली जाती है । कुछ की मजबूरियां रहती हैं,...

क्या मेरी कुछ ऐसी गलतियां रही हैं जो माफी लायक नहीं है

जैसे भी हो, अब आप खुश होकर जीजिए । अब मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा ।  अब मेरी न कोई आशा है, न कोई ख्वाब, न कोई चाह । मुझे अपनी सीमाएँ मालूम थी । ईश्वर से बड़ा कोई नहीं । जाइए, मगर सजा देकर नहीं । लगता है मैं कौन बड़ा पाप कर दिया । जानता कि आपको छुने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी । मैं कभी नहीं छुता ।  इतना कोई निष्ठुरता से जाता है ? आपको क्या मालूम आपको देखने मात्र से मुझे कितनी खुशी मिलती थी । सारा संसार जी लेता था । चले जाइए मुझसे दूर । मेरा सबकुछ सूना करके । क्या पढी हैं कि मेरी आत्मा को नहीं पढ़ पाई ? मैंने आपको पढा- मैंने सीमाएँ नहीं लांघी ।मेरी आत्मा कभी नहीं धिक्कारेगी कि मैंने आपको सम्मान नहीं दिया । मेरी आत्मा आपके कदमों की धूल की भूखी थी । ऊपर से दिखने वाली मेरी जिद्दें जिद्द नहीं थीं । आपके प्रेम के आगे सब निष्फल थे । जैसे आप मुझे बचाना चाहती थी मैं भी आपको बचा रहा था ।