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कुशवाहा क्षत्रिय की एक परंपरा।

कुश जयंती के इर्द-गिर्द ..........................… "कुशवाहा क्षत्रिय " के बीच एक बहुत ही सुंदर परंपरा रही है,जिसमें कुशवाहा नौजवान या युवती को "कुश जयंती" के दिन एक संस्कार ग्रहण कराया जाता है और उस संस्कार का नाम "हस्त खड़ग्" या "धनुष ग्रहण" संस्कार है। इस दिन कुशवाहा युवक या युवती स्नानादि करके पीले वर्ण के वस्त्र धारण करते हैं। श्री राम चंद्र  व सीता मां के चरणों पर पुष्पांजलि अर्पण कर "सम्राट कुश" का पूजन करते है।पूजनोपरांत पिता द्वारा युवक के हाथ में' खानदानी तलवार 'को  पूजन के बाद सम्मान के साथ ,शिश झुकाकर धारण कराया जाता है और युवती को मां द्वारा"धनुष ग्रहण"कराया जाता है। यह संस्कार विशेष पूजन विधि के बाद संपन्न होता है। पहले के युग में यह संस्कार बारह वर्ष की उम्र में ही करा दिया जाता था,पर अब अठारह वर्ष या शादी के दिन भी पूर्व में नहीं होने पर कराया जाता है। इस दिन युवक यह शपथ लेते हैं कि धरती, परिवार,जाति ,इलाका व राष्ट्र की इज्जत की सुरक्षा वे करेंगे तथा सम्मान के साथ जिएंगे तथा याचक कभी नहीं बनेंगे।इस दिन ...

बनाफ़र चंद्र

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बनाफ़र चंद्र का नाम आपने जरुर सुना होगा। हाँ,वहीं बनाफ़र चंद्र जिनका "ज़मीन" उपन्यास जगदीश मास्टर के जीवन संघर्ष पर आधारित है,कितना कुछ सच लिखा है,उन्होंने इस उपन्यास में। ये भी मूलत:रोहतास के मूल निवासी रहे।काराकाट के श्रीरामपुर गाँव जो बाराडीह के पास है,हां वहीं श्रीराम पुर जहाँ घोड़े बहुत हैं। वहीं के थे बनाफ़र चंद्र, मूल नाम-रामचंद्र सिंह।वीर बांकुरा बनाफ़र।इनका जन्म भी इसी जुलाई के महीना में हुआ था,०२ तारीख़ सन् १९५० को।और बाद में भोपाल में रहते थे। एक बार मेरे फूफा जी के भाई से इनकी पुत्री की शादी की बात चली थी,पर हो न पाई।फूफा जी के पिता जी और बनाफ़र चंद्र दोनों एक साथ काम करते थे। मेरी इक बनाफ़र भाभी की रिश्तेदारी बनाफ़र चंद्र जी के खानदान में में ही है,जिसकी वज़ह गाँव के बहुत लोग उनके बनाफ़र चंद्र जी के परिवार को जानता है। वे भले लोग हैं। उन्हें अन्याय पसंद नहीं।आल्हा-ऊदल जैसे अटल।१९९६ ई.में इन्हें रेणु सम्मान मिला। ऐसे महान व दिलदार को हिंदी साहित्य भला कैसे भूला देगा। बस्ती और अंधेरा,अधूरा सफ़र जैसे उपन्यासों के प्रणेता !          कुछ लोगो...

बाल मुरली सिंह की छह कविताएँ

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बाल मुरली सिंह की छह कविताएँ ......... १.खोज ...... मैं निकला उस राह पर, जिस राह पर न था कोई, विपुल सौरभ गुलाब का देख,पंकज बन गया मेरा मन मृदु मुख था,थका था पैर, तब भी चलता रहा मैं, चलते-चलते हिमाद्री पाया, प्रशस्त हुआ मेरा मन। हिमाद्री को छोड़ प्राची चला, फिर पहुंचा उदधि के पास, दिग्-दिगंत सभी को देखा, तब पुलकित हुआ मेरा मन। हृदय को स्तब्ध कर, देखा उस विराट रूप को, जो उथल-पुथल कर, कह रहा था मुझसे, जागृत करो अंतर्मन। २.कोहरा  ......... ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला। पल भर में अपना रंग दिखा, कर दिया जग को अंधकार, ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला। कहीं हुई बस दुर्घटना, कहीं शीतलहरी की जा़र, ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला। बच्चे-बुड्ढे को बहुत सताते हो, पृथ्वी पर फैला देते अंधकार, ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला। ट्रक तो ठप हो जाते, वायुयान रुक जाते हैं, क्या यही है अर्ध विराम? ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला, सूर्य के उगते हो जाते विलुप्त हो, पता नहीं चलता कि कहां रहते हो ये कोहरा कहां से आया, मुझको तुम बतला। सर्दियों में जन्मते हो, पर,गर्मियों में हो जाते ...

फ्रीडम फाइटर रामधारी सिंह

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सामाजिक क्रांति के योद्धा फ्रीडम फाइटर रामधारी सिंह एवं रोहतास की भूमि  ................................ ....................डॉ.हरेराम सिंह.. समाज में कई तथ्य ऐसे हैं जिसे बहुत ही चालाकी से छुपा दिया गया है ताकि ओबीसी का मनोबल बढ़े नहीं ,ऐसा बहुत कुछ ब्रिटिश काल के समय और उसके बाद हुआ है ।डॉ ललन प्रसाद सिंह की मानें तो भारत की ऐसी बहुत सी जातियां हैं जो प्राचीन काल और मध्य काल में शासक रही हैं और आज वह सामाजिक आर्थिक या राजनीतिक स्तर पर पिछड़ गई हैं। कुशवाहा ,यादव, कुर्मी ,लोधी ,बिंद आदि कई जातियां बहुत ही मजबूत स्थिति में रहे हैं इतिहास में; पर जमीन पर अंग्रेजों के कब्जे और उनके हाथों से राजपूत व भूमिहारों और कहीं ब्राह्मणों के हाथों में जमीनों के खिसकने और सत्ता में इनके आने के बाद -बहुत से प्रमुख जातियां हाशिए पर चली गईं। बिहार के पिछड़ों में खासकर रोहतास के बहुतों के पास जमीनें थीं और यह जमीनें कई राजनीतिक कारणों से उनके हाथों से निकल गए, फिर भी पिछड़े समाज के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी ।और लगातार संघर्ष कर रहे हैं ।इनके संघर्ष और शौर्य की गाथा को लिखने की जरूरत है।इतिहासकार जेम...

कुशवाहा सुमित्रा देवी कि सुशील बहू मीरा कुमार

कुशवाहा आगे आओ  .......... बिहार की पहली महिला कैबीनेट मंत्री कुशवाहा समाज से थीं। नाम था सुमित्रा देवी।बहुत ही सुशील व प्रतिभासंपन्न महिला।कुशवाहा समाज की राजनीतिक ताकत।पर,दुर्भाग्य कि इन्हें बहुत कम लोग जानते हैं-कुशवाहा समाज को,पर इनकी बहू यानी कुशवाहा  समाज की बहू मीरा कुमार जी(जगजीवन राम जी की पुत्री व पूर्व लोकसभा स्पीकर) को लगभग सभी लोग जान रहे हैं ।इनके पति मंजुल कुमार जी कुशवाहा समाज से हैं। सुंदर जोड़ी मंजुल कुमार व मीरा कुमार    ने एक सुंदर व सभ्य बालक को जन्म दिए जो कुशवाहा समाज के हीरा हैं,नाम है-अंशुल अभिजीत।         सुमित्रा जी के दूसरे लड़के राजशेखर जी कुशवाहा समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं।कुशवाहा समाज चाह रहा है कि कुशवाहा सुमित्रा देवी के दोनों पुत्र मंजुल कुमार व राजशेखर जी व पोते अंशुल अभिजीत जी बिहार व देश के कुशवाहा समाज का प्रतिनित्व करें। **जय कुश**जय कुशवाहा क्षत्रिय**

शार्दूल कुशवंशी की भोजपुरी कविताएँ

शार्दूल कुशवंशी की भोजपुरी कविताएँ ........ बुधुआ ....... जिनगी भर बुधुआ पाथते रह गइल खपड़ा-नरिया, तबो न छवाइल ओकर घर हो, फूस के फूसे रह गइल, चमकल ना दीवाल,अउरी फरस हो, जाति के कुम्हार रहे उ,घड़ा भी उ पारत रहे, गांव के पंडित जी के घरे,फिरिये में पहुंचावत रहे, ओकर पसंद ना रहे ,ई काम  आपन मेहरी से बतियावत रहे, पर ,डर रहे कि कहीं गांव से उ निकालल न जाओ, काहे कि ओकर आपन जमीन ना रहे, ई सोच-सोच उ आपन के कोसत रहे, विधना के गरियावत रहे। .... बाँस ..... बाँस के कोठी में भूआ फूटल, कि सगरे बात फैल गइल, कोयरी-कुरमियन के कमाई पे  टिकल बा जान, ई काहे बोललस बात, बबुआनन के मुहल्ला में शोर मच गइल, गाँव में हो गइल ताना-तनी,बैक्वर्ड-फारवड के बात भइल, कोईरी-कुम्हार,अहिर-चमार सब एक भइले, तिवारी के फाटल कपार, अब एहनी के उलझावल जाव, नाहीं त हमनी के चल जाई राज, मिसिरा जी समझईले रात के, बबुआन टोली में बात, तबे एगो लइका उठके जोर से बोललस, मार ओहनी के लात, यह प सिगासन सिंह उठले,बोलले खबरदार! तोहनी के बइठले खाय के आदत कब जाई? अउर उल्टा बोले हजार, पंडित जी के हिगरा के बोलले, उ बांस के कोठी में बांस जनमल ब...

धूप ही धूप

जिंदगी छांव खोजती है,पर मिलती कहां है वह और जिंदगी गूजर जाती है ऐसे ही। लोग पूछते हैं हमसे कि क्या पाया जिंदगी में? मैं जवाब देता हूं-धूप ही धूप! वे यह सुन थोड़ा गंभीर होते हैं और थोड़ा मुस्कुराते हैं और धीरे से पर हां में गर्दन झुकाते हुए कहते हैं ठीक कहते हैं भाई मेरे और मैं भी मुस्कुरा देता हूँ एक हाथ थोड़ा उपर कर कि आज धूप बहुत कड़ी है, पर ,कड़ी होने से क्या? +++डॉ.हरेराम सिंह+++