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जी रहा हूँ

आपको जी रहा हूं मन के स्तर पर हृदय के स्तर पर .......... .......... आगे डर भी लगता है आप कहीं दूर न जाएँ ......... कुछ नहीं.... 🌹♥️ I love 💕 you!!! हे माँ ! मेरे जीवन को सरल बना दे । मैं किसी को कष्ट नहीं देना चाहता । लेकिन, माँ कभी- कभी ऐसा लगता है कि मैं कितना अभागा हूँ । मेरे अभ्यांतर को कभी- कभी इतना कष्ट क्यों देती हो माँ ! माँ, क्या मैं सचमुच गलत हूँ ? क्या मैं अपने जीवन में किनारा नहीं पाऊँगा ? मुझे किनारा दो माँ ! मुझसे असीम धैर्य, आँखों में प्रतीक्षा और हृदय में कभी रिक्त न होने वाला प्रेम में दो । .... कुछ सजा भी । देर रात मुझे नींद नहीं आ रही.... ये आँख के आँसू सूख- सा गए ... निकल भी नहीं रहे हैं... कि जी हल्का हो जाए । इस दुनिया को जीतकर क्या करूँगा? सबकुछ मिलेगा, पर आप नहीं मिलोगे । जब दिल आपको खोजता है तो यह सुनहरी दुनिया फीकी लगती है । पाँच मिनट की मुलाकात भी सुकून दे जाती । पर वह भी नहीं । जहाँ स्वीकार्य है वहाँ गलत नहीं है । जहाँ अस्वीकार्य है वहाँ गलत ही गलत है । लेकिन यह गलत सही पूर्णतः आप लड़कियों पर निर्भर करता है । यदि प्रेम में लड़की का पक्ष इंकार का है तो लड़क...

शुद्ध हिन्दी

हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'ऐं' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...। जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं, जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...। इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।  इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।  'नई' ग़लत है, सही शब्द 'नयी' है...  मूल शब्द 'नया' है, उससे 'नयी' बनेगा...। क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...? ('मिलाई' ग़लत है...।) आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...। ('जताई' ग़लत है...।) उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।) अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...। बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाय...

धंधा

दोस्ती का धंधा .........लघु-कथा... एक आदमी के बारह दोस्त थे.बारहों में से चार कहने के ,चार सचमुच के और चार जरूरत पड़ने पर उसके पक्ष में लाठी लेकर खड़े रहने वाले दोस्त थे.पहले चार जब भी मित्र की हाल-चाल जानने के लिए फोन करते,वह फोन काट देता.ये चारों समझते हमसे कोई भूल हुई है.पर उसका दोस्त समझता-ससुरे !फोन कर माथा चाटेगा.इसलिए काटो.पर,इसकी जब जरूरत पड़ती फोन लगाता और आए दिन पैसे का डिमांड करता.पैसा मिलता तो ठीक,वरना दोस्ती कैसी?इस बात को पहले चार कभी समझ नहीं पाए;क्योंकि चारों कभी आपस में मिले न थे,न एक दूसरे को जानते थे.किसी ने एक बार उसमें से एक को समझाया था कि वह दोस्त जिसे तुम दोस्त समझ रहे हो;वह तो तुम्हें दोस्त समझता ही नहीं है.क्योंकि उसकी बहन से मुझे प्यार हो गया था.वह भी मुझसे पैसे ठगती.मैं प्यार में डूबा रहता.पर वह तो 'इनज्वाय'दूसरे से करती.उसके भी बारह दोस्त थे.चार को बारी-बारी से इस्तेमाल करती ,चार से 'इनज्वाय'करती और चार को फुसलाकर-मुस्कान पर ही अपने पक्ष में लड़ने के लिए खड़ा किये रहती है.जो तुम्हारा दोस्त है वह बारह के अलावा दो सगी बहनों से दोस्ती कर लिया ह...

वह लड़की

नींद में पढ़ रहा हूँ... एक लड़की मुझे कभी प्यार , कभी गुस्से से पढ़ा रही है- 1. नर्मल रहिए... कुछ नहीं होगा । 2. प्रैक्टीकल बनिए... 3. इतना भावुकता अच्छी नहीं 4. रिलैक्स... रिलैक्स... 5. सेलफिस बनिए.... 6. पटना है... आरा नहीं 7. प्रेम में तड़पिएगा... अचानक DP गायब । मैं अपनी माँ को ढूँढ़ता हूँ। माँ ... वह लड़की गायब हो गई... वह पूछती हैं... कौन ? ........ ........ मैं माँ से कहता हूँ... जो तुम- सा दिखती है । माँ ... समझ जाती हैं... वे कहती हैं... बहुत तड़पाती है... ! फिर वे सोचते हुए कहती हैं... दूर चली जाएगी तो क्या करोगे? मैं चुप हो जाता हूँ। माँ टुकुर-टुकुर निहार रही है । अचानक माँ के आँचल में छिपना चाहता हूँ। तभी होश आता है- माँ तो कब की चल बसी है । मैं उस लड़की की आँचल में पनाह लेना चाहता हूँ... जैसे वह माँ हो। तभी मुझे समझ आता है- माँ जैसी ही होती है - प्रेमिकाएँ । तभी कहीं से आवाज सुनाई देती है- बिल्कुल जानी- पहचानी । माँ जैसी- "किसी से इतनी मुहब्बत ठीक नहीं है बेटा । तुम्हें जिंदा रहना है।"

कवि - आलोचक रामप्रकाश कुशवाहा जी ने लिखा-

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डा.हरे राम सिंह वैसे तो स्वयं ही कई पुस्तकें लिख कर एक स्थापित नाम है ।। उनके समर्थ गद्य और धारदार आलोचना से मैं पूर्वपरिचित रहा हूं। उनके कवि रूप से मैं अपरिचित था । इसलिए जब उन्होंने अपनी कविताओं पर मेरे अभिमत और दृष्टि की अपेक्षा की तो मैंने स्वयं को उनकी कविताओं के प्रथम परीक्षक की भूमिका में पाया । पढ़ने पर उनकी कविताओं में हुए नए मौलिक प्रयोगों ने मुझे चौंकाया। मैं कविता में समूह लेखन को बहुत अच्छा नहीं मानता । उसको कुछ -कुछ सामूहिक नकल की तर्ज़ पर देखता हूं। हिन्दी में बिरादराना संस्कार के कारण और विकल्प में स्कूल राइटिंग का प्रचलन है । पेशेवर मीडिया बाजार प्रभाव के कारण एक खास रुचि और तरह के लेखन व ब्रांड बन चुके लेखकों को ही बेचने के दबाव में बार-बार चुनती और प्रकाशित करती है। इस कारण से न चाहते हुए भी अच्छे लेखक और कवि समरूप लेखन के शिकार होकर जुड़वा पैदा करने लगते हैं । क्योंकि बाजार ऐसी कविताओं और कवियों को संरक्षण प्रदान करता है इसलिए ऐसे ही कवि और लेखक मुख्य धारा के स्थापित रचनाकार मान लिए जाते हैं । लेकिन इस बाजार वाद का दुष्प्रभाव यह है कि ऐसा तर्ज़ या समरूप ले...

ग्रेस इंडिया बेस्ट हिन्दी साहित्य सम्मान-2024

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प्रिये साथियो,          मुझे प्रसन्नता है कि Grace India Educational charitable Trust ने हिन्दी साहित्य में मेरे द्वारा दिए गए विशेष साहित्यिक योगदान के लिए Best Hindi Literature Award -2024 प्रदान करने का निर्णय लिया। मैं इसे सहर्ष क़ुबूल करता हूँ। मेरे जीवन की सुंदर उपलब्धियों में से यह भी एक है; और खास भी। Trust विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रतिभाओं एवं इस देश को सुंदर, मानवीय और संवेदनशील बनाने में योग देने वाले साहित्यकारों, शिक्षाविदों और समाज सेवियों आदि को सम्मान दे रहा है तो इससे उसके सुंदर स्वप्न, सुंदर उद्देश्य और सुंदर कल्पनाशीलता का पता चलता है। Trust के त्याग और समर्पण का मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ। मेरा साहित्य वंचितों, स्त्रियों, किसान एवं मजदूरों के लिए समर्पित है और मेरा जीवन भी। मनुष्य अपने किसी एक एक्टिविटी से यदि दुनिया के किसी एक भी प्राणी को सुरक्षा, कल्याण एवं खुशी प्रदान करता है जिससे या जिसके संदेशों से मानवता पुष्ट होती है, निश्चित ही उस व्यक्ति का कार्य महान् है और वह व्यक्ति भी। बुद्ध , मार्क्स , कबीर एवं प्रेमचंद ऐसे ही थे। सा...

समय से संवाद करता युग

समय से संवाद करता युग : एक मूल्यांकन •रामकृष्ण यादव भाई डॉ.हरॆरामजी की लगभग दो दर्जन रचनाएं विभिन्न प्रकाशनों से छप चुकी है। लेखन कला की उनमें अद्भुत क्षमता हैं।वे विगत 10 वर्षों से निरंतर लेखन कार्य कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी सद्यः प्रकाशित एक लंबी कविता पुस्तकाकार रूप में मुझे भेंट की। एक कविता- वह भी सौ पृष्ठों की! यह लम्बी कविता उनका एक अनूठा प्रयोग है। हो सकता है मुक्तिबोध की लंबी कविता पढ़कर उन्हें यह कविता लिखने की प्रेरणा मिली हो। वैसे कुछ अन्य कवियों की लंबी कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं और चर्चित भी। डॉ हरेराम सिंह की कविता का शीर्षक है- 'समय से संवाद करता युग'।  एक युग कालखण्ड से निर्मित होता है। काल यानी समय। एक कालखंड में जीवन के विभिन्न रंग,रूप,स्थितियाँ परिस्थितियाँ समाहित रहती हैं। जैसे ही स्थितियाँ- परिस्थितियाँ बदलती हैं , एक नये युग का शुभारंभ होता है। हालांकि संधिकाल में यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होता है। पर कालांतर में जब हम बदलाव  अनुभव करते हैं, तब हम एक नये युग का हिस्सा होते हैं।  समय निरंतर चलते रहता है। इसलिए हम कब एक नये ...