ग़ज़ल
सपने की हकीकत, बयां करते नहीं ।
टूट जाते हैं इक दिन, बयां करते नहीं ॥
जिन्हें देखा था कि वे हमदम हैं ।
वे हमदम नहीं, बयां करते नहीं ॥
हसीनों से दोस्ती न कर तू ।
वे बदल जाती हैं, बयां करती नहीं ॥
ख्वाबों की मल्लिका, ख्वाब ही रहती हैं ।
इस सच को कहीं, बयां करते नहीं ॥
आदमी है तो उम्मीद तो रक्खेगा ही |
उम्मीदें टूट जाती हैं, बयां करते नहीं ॥
कहीं गफ़लत में जीने से अच्छा है ।
जी जिंदगी ऐसे ही, बयां करते नहीं ॥
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