सबक

लोग किसी भी रिश्ते की शुरुआत सुंदर कल्पनाओं से करते हैं और अपनी मूर्खताओं की वजह उसे बदसूरत बना देते हैं । कहाँ हमलोगों को खुशी के साथ, सम्मान के साथ और प्रेम के साथ एक दूसरे को समझते हुए जीना चाहिए था और कहाँ हम एक- दूसरे से शिकवा- शिकायत शुरू कर दिए । यहाँ तक कि बोलने बतियाने और कुछ उत्सव मनाने से कतराने लगे । छिः मूर्खता का हद है ! शरीर नहीं तो जीवन कैसा, उत्सव कैसा ? शरीर मन के उत्सव को साकार करने का माध्यम है । शरीर है तो कोई रिश्ता है- पति है, प्रेमी है या ब्यायफ्रेंड । पुरुष के लिए माँ, पत्नी, बेटी या कोई फ्रेंड या गर्लफ्रेंड ।

पवित्रता- अपवित्रता सब मन की उपज है।  

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