सब टूट रहे हैं
सब टूट रहे हैं…
— हरेराम सिंह
सब टूट रहे हैं—
पेड़ों की शाखों की तरह नहीं,
भीतर की निस्तब्धता की तरह;
जहाँ आवाज़ नहीं होती,
केवल दरारें जन्म लेती हैं।
समय
धीरे-धीरे
मनुष्य के भीतर उतरता है
और एक दिन
उसके विश्वासों को
रेत की तरह बिखेर देता है।
टूटना भी विचित्र है—
यह एक क्षण में नहीं होता।
पहले उम्मीद टूटती है,
फिर प्रतीक्षाएँ,
फिर संबंधों का संगीत;
और अंत में
मनुष्य अपनी ही आँखों में
अजनबी हो जाता है।
इंसान मिट्टी से बना है—
इसलिए
हर ठोकर उसे
उसकी नश्वरता का बोध कराती है।
वह गिरता है,
संभलता है,
फिर गिरता है;
मानो जीवन
उसे बार-बार
अपूर्ण होने का अर्थ सिखा रहा हो।
कुछ मोड़ ऐसे आते हैं
जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं।
सब्र
सूखी शाख की तरह चटकता है,
विश्वास
काँच की तरह बिखरता है,
और रिश्ते
धीरे-धीरे स्मृतियों में बदल जाते हैं।
तब आदमी
रोता भी नहीं—
बस भीतर
एक लंबी खामोशी लेकर
जीता रहता है।
शायद
टूटना ही
मनुष्य होने की
सबसे सच्ची अवस्था है।
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