गज़ल
ग़ज़ल
— हरेराम सिंह
सीने में ग़म लिए हम मुस्कुरा नहीं सके,
तेरे बिना जहाँ में चैन पा नहीं सके।
जिसको भी अपना समझा, वही बदल गया,
हम अपने दर्द का किस्सा सुना नहीं सके।
रिश्तों की भीड़ थी मगर सब अजनबी लगे,
हम एक सच्चा आदमी बचा नहीं सके।
वह ख़्वाब टूटकर धुएँ में यूँ बिखर गया,
आँखों में फिर कोई सपना सजा नहीं सके।
हर मोड़ पर उम्मीद ने आवाज़ तो दी,
लेकिन कदम थके थे, आगे बढ़ा नहीं सके।
तस्वीर, ख़त, किताबें सब बोलती रहीं,
हम अपने दिल को फिर भी बहला नहीं सके।
तक़दीर से लड़ाई में उम्र कट गई,
हम अपनी हार का कारण बता नहीं सके।
अब भी कहीं से लौट के आ जाएँ वो अगर,
हम इस दिल-ए-उदास को समझा नहीं सके।
जीते रहे हैं फिर भी अधूरी-सी आस में,
हम टूटकर भी खुद को मिटा नहीं सके।
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