डॉ. हरेराम सिंह : समकालीन हिन्दी साहित्य का जनपक्षधर और बहुआयामी स्वर
डॉ. हरेराम सिंह : समकालीन हिन्दी साहित्य का जनपक्षधर और बहुआयामी स्वर
• सुमन कुशवाह
समकालीन हिन्दी साहित्य में कुछ ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कविता, कहानी, आलोचना, उपन्यास, संस्मरण और वैचारिक लेखन— सभी क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। डॉ. हरेराम सिंह उन्हीं महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों में से एक हैं। वे केवल कवि नहीं, बल्कि समाज के भीतर चल रही हलचलों, संघर्षों, प्रेम, करुणा, असमानता और मनुष्यता की टूटती-बनती दुनिया के सजग साक्षी हैं। उनकी रचनाओं में गाँव है, खेत हैं, मजदूर हैं, स्त्रियों की पीड़ा है, दलित जीवन का संघर्ष है, युवाओं के सपने हैं, प्रेम की गरिमा है और व्यवस्था के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध भी है।
डॉ. हरेराम सिंह का साहित्य किसी बंद कमरे की बौद्धिक कसरत नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों से उपजा हुआ साहित्य है। उनकी रचनाएँ आम आदमी की भाषा में लिखी गई हैं, इसलिए वे पाठकों के मन तक सीधे पहुँचती हैं। वे साहित्य को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं मानते, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और मानवीय मुक्ति का उपकरण भी समझते हैं।
जन्म, परिवार और शिक्षा
डॉ. हरेराम सिंह का जन्म 30 जनवरी 1988 ई. को बिहार के रोहतास ज़िले के काराकाट प्रखंड अंतर्गत करूप इंग्लिश गाँव में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। इनके पितामह लालमोहर सिंह तथा पिता रामविनय सिंह थे। माता तेतरी कुशवंशी एक संवेदनशील और कर्मठ गृहिणी थीं। ग्रामीण परिवेश में बीता बचपन इनके भीतर लोकजीवन, प्रकृति और मनुष्य के संघर्ष को गहराई से देखने की दृष्टि विकसित करता है।
इनकी प्रारंभिक शिक्षा करूप और गोड़ारी में हुई। मध्य शिक्षा ईटवा तथा माध्यमिक शिक्षा हाई स्कूल बुढ़वल से प्राप्त की। इंटरमीडिएट एवं स्नातक (प्रतिष्ठा) की पढ़ाई अनजबित सिंह कॉलेज, बिक्रमगंज, रोहतास से हुई। बाद में इन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. तथा वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय से शोध उपाधि प्राप्त की।
भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन में इनकी विशेष रुचि रही। “गोदान और छह बीघा ज़मीन का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर इनके शोधकार्य ने साहित्यिक जगत का ध्यान आकर्षित किया।
साहित्यिक सक्रियता और वैचारिक स्वर
हरेराम सिंह की साहित्यिक सक्रियता अत्यंत व्यापक रही है। उनकी कविताएँ, शोधालेख, आलोचनात्मक निबंध और वैचारिक लेख हंस, जनपथ, सृजना, फॉरवर्ड प्रेस, आजकल, नईधारा, शोध-धारा, युग-सरोकार, अर्जक, पहचान, बुद्धवाणी, सृजन-सरिता, नवल आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। वे कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और साहित्यिक सम्मेलनों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं।
उनकी वैचारिकी मूलतः जनपक्षधर है। वे साहित्य को सामाजिक परिवर्तन और मानवीय मुक्ति का माध्यम मानते हैं। उनके भीतर प्रगतिशील चेतना और बहुजन दृष्टिकोण का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। वे दलित, स्त्री, किसान, मजदूर और हाशिए के समाज के प्रश्नों को साहित्य के केंद्र में लाते हैं।
साहित्यिक व्यक्तित्व और वैचारिक धरातल
हरेराम सिंह का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे कवि भी हैं, आलोचक भी; कथाकार भी हैं और चिंतक भी। उनकी चेतना का मूल स्वर जनपक्षधरता है। वे हाशिए पर खड़े मनुष्यों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। उनकी कविता में किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, बेरोजगार युवा और गाँव का संघर्षरत आदमी बार-बार उपस्थित होता है।
वे साहित्य को समाज से अलग नहीं मानते। उनकी रचनाओं में प्रेम और प्रतिरोध साथ-साथ चलते हैं। एक ओर वे माँ, प्रेम, स्मृति और प्रकृति को अत्यंत आत्मीयता से चित्रित करते हैं, तो दूसरी ओर सत्ता, पूँजीवाद, सामाजिक अन्याय और सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध तीखा स्वर भी उठाते हैं।
उनकी वैचारिकी पर प्रेमचंद, मुक्तिबोध, धूमिल, केदारनाथ सिंह, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों की परंपरा का प्रभाव देखा जा सकता है।
कविता : प्रेम, प्रतिरोध और मनुष्यता की आवाज़
हरेराम सिंह मूलतः कवि हैं। उनकी कविताओं में जीवन के प्रति गहरा अनुराग दिखाई देता है। वे प्रेम को केवल निजी भावना नहीं मानते, बल्कि मनुष्य को बचाए रखने वाली सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं।
उनका चर्चित कविता-संग्रह “नीम की पत्तियों से उतरती चाँदनी” प्रेम और जीवन की सुंदरता का अद्भुत दस्तावेज़ है। इस संग्रह में ग़ज़ल की लयात्मकता और कविता की संवेदनात्मक गहराई का सुंदर मेल दिखाई देता है। कवि मानता है कि प्रेम ही जीवन को सुंदर बनाता है। यदि प्रेम है, तो संघर्ष भी सुंदर लगते हैं, पेड़-पौधे भी अपने लगते हैं और दुनिया में उम्मीद बची रहती है।
दूसरी ओर “रात गहरा गई है!” जैसे संग्रहों में व्यवस्था के दोहरे चरित्र, दलितों की पीड़ा, किसानों की त्रासदी और जनसंघर्ष की बेचैनी दिखाई देती है। इस संग्रह में कवि ने जननायकों, संघर्षशील व्यक्तित्वों और सामाजिक स्मृतियों को आदर के साथ याद किया है।
“हाशिए का चाँद” आम लोगों के जीवन-संघर्ष का काव्यात्मक दस्तावेज़ है। इसकी भाषा अत्यंत सहज और जनसुलभ है। कवि दलित जीवन, सत्ता के छल और सामाजिक विडंबनाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
इसी तरह “रात के आख़िरी पहर तक” संग्रह में कवि मनुष्यता को बचाए रखने की जिद के साथ उपस्थित होता है। वह गाँव, माँ, रिक्शावाले, दोस्त, महुआ के पेड़, स्त्रियों और आम जन के दुःख को अपनी कविता का विषय बनाता है।
उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं—
•हाशिए का चाँद
•रात गहरा गई है!
•पहाड़ों के बीच से
•मैं रक्तबीज हूँ!
•चाँद के पार आदमी
•रोहतासगढ़ के पहाड़ी बच्चे
•रात के आख़िरी पहर तक
•नीम की पत्तियों से उतरती चाँदनी
•मुक्ति के गीत
•बुद्ध तड़पे थे यशोधरा के लिए!
•मेरे गीत याद आएँगे
•इतिहास के पन्ने
•जामुन का पेड़
•जड़ से काटी गई स्त्री
•वैशाली की पूनो
•समय से संवाद करता युग
•रास्ते तो मिल जाएँगे
कहानीकार : गाँव, स्त्री और बदलते समाज का कथाकार
हरेराम सिंह की कहानियाँ ग्रामीण जीवन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति तथा ग्रामीण जीवन का जीवंत दस्तावेज़ हैं। वे छोटी घटनाओं में भी जीवन का बड़ा सत्य खोज लेते हैं। उनकी कहानियों में गाँव केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक जीवित चरित्र की तरह उपस्थित है।
“अधूरी कहानियाँ” में उन्होंने लगभग 90 कहानियों के माध्यम से जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को गहरी संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है। वे उन घटनाओं को पकड़ते हैं जिन्हें सामान्यतः लोग अनदेखा कर देते हैं, लेकिन जिनका प्रभाव मनुष्य के जीवन पर बहुत गहरा होता है।
"कनेर के फूल "उनका दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह में ग्रामीण जीवन, बदलते सामाजिक यथार्थ और युवाओं के सपनों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। इसकी कहानियाँ गाँव की मिट्टी, संघर्ष, प्रेम और युवा मन की बेचैनियों को अत्यंत आत्मीयता से अभिव्यक्त करती हैं।
“सोनम की कथा” विशेष रूप से स्त्री जीवन और उसकी आत्मसंघर्षपूर्ण दुनिया को केंद्र में रखती है। इस संग्रह की स्त्रियाँ चुप नहीं रहतीं; वे बोलती हैं, प्रतिरोध करती हैं, अपने निर्णय लेती हैं। सोनम, तेतरी, रमा, मीसा, सुगनी जैसे पात्र हिन्दी कथा-साहित्य में विशेष महत्व रखते हैं।
उनकी कहानियों में प्रेम भी है, विडंबना भी; गाँव की मासूमियत भी है और बदलते समय की क्रूरता भी।
आलोचक के रूप में डॉ. हरेराम सिंह
हरेराम सिंह का आलोचना-कर्म अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने हिन्दी आलोचना में बहुजन दृष्टिकोण, ओबीसी विमर्श और जनपक्षधरता को गंभीरता से स्थापित करने का प्रयास किया है। हिन्दी आलोचना का जनपक्ष में उन्होंने साहित्य और जनसंघर्ष के संबंधों को नए ढंग से व्याख्यायित किया है।
उनकी पुस्तक “हिन्दी आलोचना का बहुजन दृष्टिकोण” हिन्दी साहित्य के स्थापित प्रतिमानों की पुनर्व्याख्या करती है। इसमें उन्होंने प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, मुक्तिबोध, राजेंद्र यादव, निर्मला पुतुल आदि रचनाकारों का बहुजन दृष्टि से विश्लेषण किया है।
उनकी आलोचना केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई है। वे लोकसाहित्य, लोकगीत, असुर संस्कृति, हाशिए के समाज और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को आलोचना के केंद्र में लाते हैं।
उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ हैं—
•ओबीसी साहित्य का दार्शनिक आधार
•हिन्दी आलोचना का बहुजन दृष्टिकोण
•हिन्दी आलोचना का प्रगतिशील पक्ष
•हिन्दी आलोचना का जनपक्ष
• किसान जीवन की महागाथा : गोदान और छमाण आठगुंठ
•आधुनिक हिन्दी साहित्य और जन संवेदनाएँ
•ओबीसी साहित्य की आलोचना-पद्धति
•हिन्दी आलोचना : एक सम्यक दृष्टि
•हिन्दी आलोचना का समकाल
उपन्यास, आत्मकथा और अन्य लेखन
हरेराम सिंह ने विविध विधाओं में लेखन किया है।
उनकी आत्मकथा “टुकड़ों में मेरी ज़िंदगी” जीवन के संघर्षों और संवेदनाओं का दस्तावेज़ है।
“अनजान नदी” उनका चर्चित उपन्यास है।
( कवि- आलोचक : हरेराम सिंह )
संपादन और साहित्यिक सक्रियता
डॉ. हरेराम सिंह ने संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके संपादन में प्रकाशित पुस्तकों में—
'डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह : नए साहित्य और इतिहास की खोज', 'गोवर्द्धन सिंह का बहुआयामी व्यक्तित्व',
'सीडी सिंह : साहित्यिक-सामाजिक शख्सियत'
विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
वे विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं। उनकी कविताएँ, लेख और आलोचनात्मक निबंध देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं।
सम्मान और पुरस्कार
साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए डॉ. हरेराम सिंह को अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
फॉरवर्ड प्रेस साहित्य एवं पत्रकारिता सम्मान (2013)
साहित्य सेवा सम्मान (2017)
साहित्य साधना सम्मान (2020)
अशोक रत्न सम्मान (2021)
डॉ. अभय साहित्य पुरस्कार (2021)
कविवर पेद्दार रामावतार ‘अरुण’ सम्मान (2023)
डॉ. राम प्रसाद सिंह अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मान (2023)
आचार्य रामचंद्र शुक्ल सम्मान (2023)
पंडित रामदयाल पाण्डेय सम्मान (2024)
निष्कर्ष
डॉ. हरेराम सिंह समकालीन हिन्दी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने साहित्य को जीवन और समाज से गहरे रूप में जोड़ा है। उनकी रचनाओं में प्रेम है, प्रतिरोध है, करुणा है, संघर्ष है और मनुष्यता को बचाए रखने की बेचैनी भी।
वे उन साहित्यकारों में हैं जो साहित्य को केवल शब्दों का खेल नहीं मानते, बल्कि उसे समाज को बदलने और मनुष्य को अधिक मानवीय बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। उनकी रचनाएँ आज के समय में इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हाशिए के मनुष्य की आवाज़ को केंद्र में लाती हैं और प्रेम, समानता तथा न्याय की दुनिया का सपना देखती हैं।
निस्संदेह, डॉ. हरेराम सिंह समकालीन हिन्दी साहित्य के उन अग्रणी साहित्यकारों में हैं, जिनका योगदान आने वाले समय में और अधिक महत्त्व के साथ याद किया जाएगा।
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