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याद रहेंगी

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चला जाऊँगा जब इस दुनिया से क्या याद रहेंगी? यकीन मानिए याद रहेंगी तुम्हारा प्यार तुम्हारा चुंबन आँखों की काजल जो भरती थी सिर्फ मेरे लिए याद रहेंगी तुम्हारा चुपके से आना तुम्हारा इंतजार करना तुम्हारी हँसी तुम्हारी चुनरी के गोटे जिसे अक्सर छू देता था! याद रहेंगी तेरी नाराजगी तेरा इश्क़ाना चिकोटी  तेरी आँखों का सुरुर तेरी नींद में जगने की आवाज तेरी प्यारी बतकही

पलकें

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दो पल ही जी लेते, तेरे ही संग तो यह जिंदगी कभी खामोश न होती तुझसे न मिलने की तड़प जी रहा हूँ अकेला इस जहाँ में मारा फिर रहा हूँ तेरा साथ ग़र होता ये जिंदगी हसीन होती  पलकें जो भीगीं हैं वे भीगीं न होतीं अपनी खामोशी तोड़कर पल भर पास आते रुहे आराम मिलता ग़र मुझे छोड़ के न जाते

कुछ बातें

कोई घड़ी भर पहले सोच रहा था तुम्हीं को याद लम्हा बन गई थी तेरा मुस्कुराना मेरी धड़कन तेरे चेहरे की मुस्कुराहट बताती है कहानी मुहब्बत एक जादू है इसके सफ़र पर  निकलने वाले से जरा पूछ मेरे बस में था कि तुझसे करूँ प्यार तू हो न हो मेरी तेरा दिल ही बताएगा पूछते हो तो बताऊँ मेरा पता क्या है चुप क्यों हो बता मेरी खता क्या है

रात

सुप्रभात ........ कुछ तो बात है तुझमें कि खींचा चला आता हूँ लोग पूछते हैं हमसे कि क्या देख लिया है! रात न जाने कैसे सर्द में तब्दील हो रही है तुम्हारी यादें गर्म ताजगी दे जाती हैं पूछता हूँ ख़ुद से कि मैं कौन हूँ गर्म साँसें तुझे ढूँढ़ लेती हैं गंगा की लहरों में एक अक्स झिलमिलाता है जब भी जाता हूँ -तुझसे मिल आता हूँ

भोजपुरी लोक-गीत, रचनाकार- हरेराम सिंह

                         [1] सुनु-सुनु रे ग्वालन लड़की , निकली तू चितचोर। अतना बड़ संसार में, लागे मनवा नाहीं मोर। तू कहाँ गंगा पार के, हम कहाँ रोहतास के। सुनु रे अहिरिन लइकी, फँसल हियरा बिन जाल के। तोहरी इयाद में जागल रहनी, हो गइले भोर। अतना बड़ संसार में, लागे मनवा नाहीं मोर। तू दीयरा के उमगल गंगा, हम मैदान के फूल। तोहरे बिछोहवा अइसे, जइसे हियरा में धंसल सूल। इ उमरिया भारी लागे, जइसे बाड़े थोर। अतना बड़ संसार में, लागे मनवा नाहीं मोर। कास फुलइले, सावन गइले, नदिया थरइले लोर। तोहरे सुरतिया बिसरत नाहीं, विरह के अगिया पोर। सुनु-सुनु रे साँवर लइकी, लहरिया उठे जोर। अतना बड़ संसार में, लागे मनवा नाहीं मोर।                             [2] पटना शहरिया से , चलली रे निंदिया। आवे में देर भइल, उदास मोरी बिंदिया। कवनी कसूर दइयो, रोवे रे सेजरिया। पनिया बीच मीन तड़पे, काटे ला रतिया। कतनो मनाई मन के, तबो न माने। अरे टूटी गइले ना, आसरा के नेहिया। सवनी बरिसवा बरसे, नाहिं...

पटना कुछ यादें

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हरेराम सिंह

युवा कवि हरेराम सिंह का कविता संग्रह ' रात गहरा गई है !  ’ कुछ समय पूर्व मुझे प्रियवर सुमन कुमार सिंह जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ ।  इसका प्रकाशन 2019 में ही हुआ था लेकिन तब से हरेराम जी से भेंट नहीं हुई है । यह पुस्तक भी वे मेरी अनुपस्थिति में ही सुमन जी को दे गए थे । यह उनका संभवतः पहला ही संग्रह है जिसके कारण इसमें उनके प्रारंभिक दौर की कुल 141 रचनाएं शामिल हैं । इसमें प्रकृति है ,परिवार है , गांव -समाज है , सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश है और कई आदरणीय लोगों के प्रति सम्मान और श्रद्धा से ओतप्रोत भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है । अपनी एक रचना में उन्होंने मुझे भी सादर स्मरण किया है। -नीरज सिंह