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डॉ. हरेराम सिंह : समकालीन हिन्दी साहित्य का जनपक्षधर और बहुआयामी स्वर

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डॉ. हरेराम सिंह : समकालीन हिन्दी साहित्य का जनपक्षधर और बहुआयामी स्वर • सुमन कुशवाह समकालीन हिन्दी साहित्य में कुछ ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कविता, कहानी, आलोचना, उपन्यास, संस्मरण और वैचारिक लेखन— सभी क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। डॉ. हरेराम सिंह उन्हीं महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों में से एक हैं। वे केवल कवि नहीं, बल्कि समाज के भीतर चल रही हलचलों, संघर्षों, प्रेम, करुणा, असमानता और मनुष्यता की टूटती-बनती दुनिया के सजग साक्षी हैं। उनकी रचनाओं में गाँव है, खेत हैं, मजदूर हैं, स्त्रियों की पीड़ा है, दलित जीवन का संघर्ष है, युवाओं के सपने हैं, प्रेम की गरिमा है और व्यवस्था के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध भी है। डॉ. हरेराम सिंह का साहित्य किसी बंद कमरे की बौद्धिक कसरत नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों से उपजा हुआ साहित्य है। उनकी रचनाएँ आम आदमी की भाषा में लिखी गई हैं, इसलिए वे पाठकों के मन तक सीधे पहुँचती हैं। वे साहित्य को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं मानते, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और मानवीय मुक्ति का उपकरण भी समझते हैं। जन्म, परिवार और शिक्षा डॉ. हरेराम सिंह का जन्म 30 जनवरी 1988 ई. ...

गजल

ग़ज़ल बहुत आराम से आपका जाना हमें याद है ! जाना था इक दिन आपको, आपका जाना हमें याद है ! कितना कहा, थोड़ा ठहरने की आरजू हमने की । फिर भी न ठहरे, आपका मुस्कुराकर जाना हमें याद है ! वह तारीख मेरे लिए बहुत ग़म लेकर आई थी । आपकी किस्मत में किसी का दाखिल होना हमें याद है ! हम हार गए थे, आप पूरी तरह जीत गए थे । मुझे उस हाल में छोड़कर, आपका दूर जाना याद है ! हम अपनी किस्मत पे रात भर राते रहे ।किसी और की बाहों में आपग खेलना हमें याद है !

गज़ल

ग़ज़ल — हरेराम सिंह सीने में ग़म लिए हम मुस्कुरा नहीं सके, तेरे बिना जहाँ में चैन पा नहीं सके। जिसको भी अपना समझा, वही बदल गया, हम अपने दर्द का किस्सा सुना नहीं सके। रिश्तों की भीड़ थी मगर सब अजनबी लगे, हम एक सच्चा आदमी बचा नहीं सके। वह ख़्वाब टूटकर धुएँ में यूँ बिखर गया, आँखों में फिर कोई सपना सजा नहीं सके। हर मोड़ पर उम्मीद ने आवाज़ तो दी, लेकिन कदम थके थे, आगे बढ़ा नहीं सके। तस्वीर, ख़त, किताबें सब बोलती रहीं, हम अपने दिल को फिर भी बहला नहीं सके। तक़दीर से लड़ाई में उम्र कट गई, हम अपनी हार का कारण बता नहीं सके। अब भी कहीं से लौट के आ जाएँ वो अगर, हम इस दिल-ए-उदास को समझा नहीं सके। जीते रहे हैं फिर भी अधूरी-सी आस में, हम टूटकर भी खुद को मिटा नहीं सके।

सब टूट रहे हैं

सब टूट रहे हैं… — हरेराम सिंह सब टूट रहे हैं— पेड़ों की शाखों की तरह नहीं, भीतर की निस्तब्धता की तरह; जहाँ आवाज़ नहीं होती, केवल दरारें जन्म लेती हैं। समय धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर उतरता है और एक दिन उसके विश्वासों को रेत की तरह बिखेर देता है। टूटना भी विचित्र है— यह एक क्षण में नहीं होता। पहले उम्मीद टूटती है, फिर प्रतीक्षाएँ, फिर संबंधों का संगीत; और अंत में मनुष्य अपनी ही आँखों में अजनबी हो जाता है। इंसान मिट्टी से बना है— इसलिए हर ठोकर उसे उसकी नश्वरता का बोध कराती है। वह गिरता है, संभलता है, फिर गिरता है; मानो जीवन उसे बार-बार अपूर्ण होने का अर्थ सिखा रहा हो। कुछ मोड़ ऐसे आते हैं जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं। सब्र सूखी शाख की तरह चटकता है, विश्वास काँच की तरह बिखरता है, और रिश्ते धीरे-धीरे स्मृतियों में बदल जाते हैं। तब आदमी रोता भी नहीं— बस भीतर एक लंबी खामोशी लेकर जीता रहता है। शायद टूटना ही मनुष्य होने की सबसे सच्ची अवस्था है।

कुछ सवाल

मेरे कुछ सवाल - • स्त्री का सबसे बड़ा सुख क्या है ? • स्त्री का सबसे बड़ा दुःख क्या है ? • स्त्री किस स्थिति में सबसे प्रिय वस्तु/ रिश्ते को त्याग देती है ? • स्त्री कैसे पुरुष पर सबसे ज्यादा भरोसा करती है ? • स्त्री के जीवन में पुरुष- प्रेम का क्या महत्व है ? • स्त्री की दृष्टि में पुरुष कब घृणा का पात्र बन जाता है ? • आधुनिक युग में स्त्री किस तरह के पुरुषों को पसंद करती हैं? • स्त्री की दृष्टि में ' ईमानदार पुरुष ' का क्या अर्थ है ? • स्त्रियों की दृष्टि में जीवन में ' सुख ' और ' सफलता' का क्या मायने हैं ?

सबक

लोग किसी भी रिश्ते की शुरुआत सुंदर कल्पनाओं से करते हैं और अपनी मूर्खताओं की वजह उसे बदसूरत बना देते हैं । कहाँ हमलोगों को खुशी के साथ, सम्मान के साथ और प्रेम के साथ एक दूसरे को समझते हुए जीना चाहिए था और कहाँ हम एक- दूसरे से शिकवा- शिकायत शुरू कर दिए । यहाँ तक कि बोलने बतियाने और कुछ उत्सव मनाने से कतराने लगे । छिः मूर्खता का हद है ! शरीर नहीं तो जीवन कैसा, उत्सव कैसा ? शरीर मन के उत्सव को साकार करने का माध्यम है । शरीर है तो कोई रिश्ता है- पति है, प्रेमी है या ब्यायफ्रेंड । पुरुष के लिए माँ, पत्नी, बेटी या कोई फ्रेंड या गर्लफ्रेंड । पवित्रता- अपवित्रता सब मन की उपज है।  

ग़ज़ल

सपने की हकीकत, बयां करते नहीं । टूट जाते हैं इक दिन, बयां करते नहीं ॥ जिन्हें देखा था कि वे हमदम हैं । वे हमदम नहीं, बयां करते नहीं ॥ हसीनों से दोस्ती न कर तू । वे बदल जाती हैं, बयां करती नहीं ॥ ख्वाबों की मल्लिका, ख्वाब ही रहती हैं । इस सच को कहीं, बयां करते नहीं ॥ आदमी है तो उम्मीद तो रक्खेगा ही | उम्मीदें टूट जाती हैं, बयां करते नहीं ॥ कहीं गफ़लत में जीने से अच्छा है । जी जिंदगी ऐसे ही, बयां करते नहीं ॥

हिसाब किताब

स्त्रियाँ कहती हैं- तुम जाओ । इतना बेवकूफ नहीं हो कि मेरी भाषा समझ नहीं रहे हो । वे गुस्सा करेंगी, चिड़चिड़ापन लिए रहेंगी, सामान्य बात को जोर से कहेंगी । मतलब तुम चले जाओ मेरी जिंदगी से यानी रिश्ता खत्म । लेकिन वे अपनी बात आपके मुँह से उगलवाएँगी । हर बार आपको घेरेंगी, गलत ठहराएँगी और आपको माफी के हद तक गिरा देंगी । क्योंकि वे प्रेम में हैं । उनकी अधिकांश जिंदगी इसी खेल में बीत जाता है । इसमें जीतना उन्हें सुकून देता है । इसमें अधिक बार पुरुष छले जाते हैं । और कई बार स्त्री भी । जहाँ आकर्षपण, शोहरत और पैसे की भूख है वहाँ स्त्री छली जाती है और जहां प्रेम रहता है, वहाँ पुरुष ।  पुरुषों की कमी है कि वह अपनी पसंद की स्त्री के साथ हर स्थिति में रहना चाहता है । कुछ स्त्रियां भी ऐसी हैं। किंतु सभी नहीं । बहुत कम स्त्रियां हैं जो अपने रिश्ते के साथ लंबे समय तक बनी रहती हैं । इस टिप्पणी पर स्त्रियों की टिप्पणी अपेक्षित है । उनकी टिप्पणी बिना यह टिप्पणी अधूरी है । जब वह सीधे कहती हैं तबतक बहुत समय निकल चुका रहता है । पुरुष पीछा रह जाता है और स्त्री आगे चली जाती है । कुछ की मजबूरियां रहती हैं,...

क्या मेरी कुछ ऐसी गलतियां रही हैं जो माफी लायक नहीं है

जैसे भी हो, अब आप खुश होकर जीजिए । अब मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा ।  अब मेरी न कोई आशा है, न कोई ख्वाब, न कोई चाह । मुझे अपनी सीमाएँ मालूम थी । ईश्वर से बड़ा कोई नहीं । जाइए, मगर सजा देकर नहीं । लगता है मैं कौन बड़ा पाप कर दिया । जानता कि आपको छुने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी । मैं कभी नहीं छुता ।  इतना कोई निष्ठुरता से जाता है ? आपको क्या मालूम आपको देखने मात्र से मुझे कितनी खुशी मिलती थी । सारा संसार जी लेता था । चले जाइए मुझसे दूर । मेरा सबकुछ सूना करके । क्या पढी हैं कि मेरी आत्मा को नहीं पढ़ पाई ? मैंने आपको पढा- मैंने सीमाएँ नहीं लांघी ।मेरी आत्मा कभी नहीं धिक्कारेगी कि मैंने आपको सम्मान नहीं दिया । मेरी आत्मा आपके कदमों की धूल की भूखी थी । ऊपर से दिखने वाली मेरी जिद्दें जिद्द नहीं थीं । आपके प्रेम के आगे सब निष्फल थे । जैसे आप मुझे बचाना चाहती थी मैं भी आपको बचा रहा था ।

रिश्ता का टूटना किसी मृत्यु से कम नहीं

किसी रिश्ते का टूटना मृत्यु के समान है ! मेरी जिंदगी से आपका जाना, मुझे सबसे ज्यादा कमजोर बना दिया । आप मेरे उत्साह थे । जीवन थे । आज मेरा उत्साह चला गया । आपने अपना दिल का बोझ हल्का कर लिया । मैंने कभी नहीं समझा कि दूर जाएँगी । आप मुझसे दिखावा के लिए प्यार किए । आज मेरा सपना मर गया । आप मेरी हँसी, मेरा गर्व छीन लिए । पटना की गलियों में अब कभी हँसते हुए नहीं आऊँगा । आप मेरे लिए पूरी पटना थीं । मेरे सर की ताज़ । आपने बहुत सरलता से कह दिया, और मैं सुन भी लिया । शायद आप कोई जल्दीबाजी में निर्णय ले रहे हैं या किसी बहकावे में मुझे नहीं पाता । जब आप कमजोर होइएगा, हरेराम सिंह आपकी आत्मा के साथ खड़ा दिखेगा । एक सितारा की तरह, एक नक्षत्र की तरह । माँ कसम, मुझे कभी प्यार नहीं मिला, इसका मुझे मलाल रहेगा । मरते वक्त भी आप याद आएंगी । आपसे उम्मीद थी वह भी चला गया । आपको सच नहीं बोलना चाहिए था । इतने दिन में कितना कुछ ख्वाब देख लिया था । मुझे यकीन हो गया था कि आप मेरे जीवन को पार लगा देंगी । आज मैं पूरी तरह हार गया। शायद एक सुंदर पौधा सूख जाएगा । गंभीर व्यक्ति का प्रेम ❤️गहरा होता है । आपको अपनी बे...

उस दिन

मैं आपको सुन सकता हूँ । आपको समझ सकता हूँ ।  अपने दुःखों को ताक पर रखकर, समझौता कर सकता हूँ क्योंकि आपसे प्रेम करता हूँ । पर जिस दिन दुनिया आपकी न ही सुनेगी, न ही समझेगी उस दिन आपको लगेगा यह लड़का न सिर्फ मेरी सोच के करीब था; बल्कि दिल के भी करीब था । मुझे एक झलक पाने के लिए महीनों और कभी अंदर - अंदर वर्षों तड़पा करता था , रोया करता था , भगवान से मिन्नते मांगा करता था, उसकी हरकत बचकानी नहीं थी, उसका प्रेम था । शायद उसकी जिंदगी में प्रेम का अभाव था, आया था मुझसे प्रेम मांगने ।  और तो और उसे ही मालूम थी - टाइम, प्रेम और आदमी की वैल्यू । वह यह भी कि उसकी आँखों में पानी जरूर था । पर, वह न कमजोर था, न बहुत गरीब । वह कमजोर, भावुक , भीखेरा इसलिए था; क्योंकि वह मुझसे प्रेम कर बैठा था ...!!! वह साल में दो- तीन अच्छी मुलाकातें मांगता था जिसे वह गर्व के साथ प्रेम कह सके । वह डटकर अपनी जिम्मेवारियों को निभा भी रहा था । बस, कुछ अभाव थे उसकी जिंदगी में... जिसे पूरा कर रहा था वह मेरी आँखों में देखकर ।  आपको हैरत होगा एक दिन कि क्या मुझमें उसे दिख गया था कि वह मेरे लिए पागल था....!!!

जी रहा हूँ

आपको जी रहा हूं मन के स्तर पर हृदय के स्तर पर .......... .......... आगे डर भी लगता है आप कहीं दूर न जाएँ ......... कुछ नहीं.... 🌹♥️ I love 💕 you!!! हे माँ ! मेरे जीवन को सरल बना दे । मैं किसी को कष्ट नहीं देना चाहता । लेकिन, माँ कभी- कभी ऐसा लगता है कि मैं कितना अभागा हूँ । मेरे अभ्यांतर को कभी- कभी इतना कष्ट क्यों देती हो माँ ! माँ, क्या मैं सचमुच गलत हूँ ? क्या मैं अपने जीवन में किनारा नहीं पाऊँगा ? मुझे किनारा दो माँ ! मुझसे असीम धैर्य, आँखों में प्रतीक्षा और हृदय में कभी रिक्त न होने वाला प्रेम में दो । .... कुछ सजा भी । देर रात मुझे नींद नहीं आ रही.... ये आँख के आँसू सूख- सा गए ... निकल भी नहीं रहे हैं... कि जी हल्का हो जाए । इस दुनिया को जीतकर क्या करूँगा? सबकुछ मिलेगा, पर आप नहीं मिलोगे । जब दिल आपको खोजता है तो यह सुनहरी दुनिया फीकी लगती है । पाँच मिनट की मुलाकात भी सुकून दे जाती । पर वह भी नहीं । जहाँ स्वीकार्य है वहाँ गलत नहीं है । जहाँ अस्वीकार्य है वहाँ गलत ही गलत है । लेकिन यह गलत सही पूर्णतः आप लड़कियों पर निर्भर करता है । यदि प्रेम में लड़की का पक्ष इंकार का है तो लड़क...

शुद्ध हिन्दी

हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'ऐं' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...। जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं, जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...। इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।  इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।  'नई' ग़लत है, सही शब्द 'नयी' है...  मूल शब्द 'नया' है, उससे 'नयी' बनेगा...। क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...? ('मिलाई' ग़लत है...।) आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...। ('जताई' ग़लत है...।) उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।) अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...। बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाय...

धंधा

दोस्ती का धंधा .........लघु-कथा... एक आदमी के बारह दोस्त थे.बारहों में से चार कहने के ,चार सचमुच के और चार जरूरत पड़ने पर उसके पक्ष में लाठी लेकर खड़े रहने वाले दोस्त थे.पहले चार जब भी मित्र की हाल-चाल जानने के लिए फोन करते,वह फोन काट देता.ये चारों समझते हमसे कोई भूल हुई है.पर उसका दोस्त समझता-ससुरे !फोन कर माथा चाटेगा.इसलिए काटो.पर,इसकी जब जरूरत पड़ती फोन लगाता और आए दिन पैसे का डिमांड करता.पैसा मिलता तो ठीक,वरना दोस्ती कैसी?इस बात को पहले चार कभी समझ नहीं पाए;क्योंकि चारों कभी आपस में मिले न थे,न एक दूसरे को जानते थे.किसी ने एक बार उसमें से एक को समझाया था कि वह दोस्त जिसे तुम दोस्त समझ रहे हो;वह तो तुम्हें दोस्त समझता ही नहीं है.क्योंकि उसकी बहन से मुझे प्यार हो गया था.वह भी मुझसे पैसे ठगती.मैं प्यार में डूबा रहता.पर वह तो 'इनज्वाय'दूसरे से करती.उसके भी बारह दोस्त थे.चार को बारी-बारी से इस्तेमाल करती ,चार से 'इनज्वाय'करती और चार को फुसलाकर-मुस्कान पर ही अपने पक्ष में लड़ने के लिए खड़ा किये रहती है.जो तुम्हारा दोस्त है वह बारह के अलावा दो सगी बहनों से दोस्ती कर लिया ह...

वह लड़की

नींद में पढ़ रहा हूँ... एक लड़की मुझे कभी प्यार , कभी गुस्से से पढ़ा रही है- 1. नर्मल रहिए... कुछ नहीं होगा । 2. प्रैक्टीकल बनिए... 3. इतना भावुकता अच्छी नहीं 4. रिलैक्स... रिलैक्स... 5. सेलफिस बनिए.... 6. पटना है... आरा नहीं 7. प्रेम में तड़पिएगा... अचानक DP गायब । मैं अपनी माँ को ढूँढ़ता हूँ। माँ ... वह लड़की गायब हो गई... वह पूछती हैं... कौन ? ........ ........ मैं माँ से कहता हूँ... जो तुम- सा दिखती है । माँ ... समझ जाती हैं... वे कहती हैं... बहुत तड़पाती है... ! फिर वे सोचते हुए कहती हैं... दूर चली जाएगी तो क्या करोगे? मैं चुप हो जाता हूँ। माँ टुकुर-टुकुर निहार रही है । अचानक माँ के आँचल में छिपना चाहता हूँ। तभी होश आता है- माँ तो कब की चल बसी है । मैं उस लड़की की आँचल में पनाह लेना चाहता हूँ... जैसे वह माँ हो। तभी मुझे समझ आता है- माँ जैसी ही होती है - प्रेमिकाएँ । तभी कहीं से आवाज सुनाई देती है- बिल्कुल जानी- पहचानी । माँ जैसी- "किसी से इतनी मुहब्बत ठीक नहीं है बेटा । तुम्हें जिंदा रहना है।"

कवि - आलोचक रामप्रकाश कुशवाहा जी ने लिखा-

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डा.हरे राम सिंह वैसे तो स्वयं ही कई पुस्तकें लिख कर एक स्थापित नाम है ।। उनके समर्थ गद्य और धारदार आलोचना से मैं पूर्वपरिचित रहा हूं। उनके कवि रूप से मैं अपरिचित था । इसलिए जब उन्होंने अपनी कविताओं पर मेरे अभिमत और दृष्टि की अपेक्षा की तो मैंने स्वयं को उनकी कविताओं के प्रथम परीक्षक की भूमिका में पाया । पढ़ने पर उनकी कविताओं में हुए नए मौलिक प्रयोगों ने मुझे चौंकाया। मैं कविता में समूह लेखन को बहुत अच्छा नहीं मानता । उसको कुछ -कुछ सामूहिक नकल की तर्ज़ पर देखता हूं। हिन्दी में बिरादराना संस्कार के कारण और विकल्प में स्कूल राइटिंग का प्रचलन है । पेशेवर मीडिया बाजार प्रभाव के कारण एक खास रुचि और तरह के लेखन व ब्रांड बन चुके लेखकों को ही बेचने के दबाव में बार-बार चुनती और प्रकाशित करती है। इस कारण से न चाहते हुए भी अच्छे लेखक और कवि समरूप लेखन के शिकार होकर जुड़वा पैदा करने लगते हैं । क्योंकि बाजार ऐसी कविताओं और कवियों को संरक्षण प्रदान करता है इसलिए ऐसे ही कवि और लेखक मुख्य धारा के स्थापित रचनाकार मान लिए जाते हैं । लेकिन इस बाजार वाद का दुष्प्रभाव यह है कि ऐसा तर्ज़ या समरूप ले...

ग्रेस इंडिया बेस्ट हिन्दी साहित्य सम्मान-2024

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प्रिये साथियो,          मुझे प्रसन्नता है कि Grace India Educational charitable Trust ने हिन्दी साहित्य में मेरे द्वारा दिए गए विशेष साहित्यिक योगदान के लिए Best Hindi Literature Award -2024 प्रदान करने का निर्णय लिया। मैं इसे सहर्ष क़ुबूल करता हूँ। मेरे जीवन की सुंदर उपलब्धियों में से यह भी एक है; और खास भी। Trust विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रतिभाओं एवं इस देश को सुंदर, मानवीय और संवेदनशील बनाने में योग देने वाले साहित्यकारों, शिक्षाविदों और समाज सेवियों आदि को सम्मान दे रहा है तो इससे उसके सुंदर स्वप्न, सुंदर उद्देश्य और सुंदर कल्पनाशीलता का पता चलता है। Trust के त्याग और समर्पण का मैं भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूँ। मेरा साहित्य वंचितों, स्त्रियों, किसान एवं मजदूरों के लिए समर्पित है और मेरा जीवन भी। मनुष्य अपने किसी एक एक्टिविटी से यदि दुनिया के किसी एक भी प्राणी को सुरक्षा, कल्याण एवं खुशी प्रदान करता है जिससे या जिसके संदेशों से मानवता पुष्ट होती है, निश्चित ही उस व्यक्ति का कार्य महान् है और वह व्यक्ति भी। बुद्ध , मार्क्स , कबीर एवं प्रेमचंद ऐसे ही थे। सा...

समय से संवाद करता युग

समय से संवाद करता युग : एक मूल्यांकन •रामकृष्ण यादव भाई डॉ.हरॆरामजी की लगभग दो दर्जन रचनाएं विभिन्न प्रकाशनों से छप चुकी है। लेखन कला की उनमें अद्भुत क्षमता हैं।वे विगत 10 वर्षों से निरंतर लेखन कार्य कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी सद्यः प्रकाशित एक लंबी कविता पुस्तकाकार रूप में मुझे भेंट की। एक कविता- वह भी सौ पृष्ठों की! यह लम्बी कविता उनका एक अनूठा प्रयोग है। हो सकता है मुक्तिबोध की लंबी कविता पढ़कर उन्हें यह कविता लिखने की प्रेरणा मिली हो। वैसे कुछ अन्य कवियों की लंबी कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं और चर्चित भी। डॉ हरेराम सिंह की कविता का शीर्षक है- 'समय से संवाद करता युग'।  एक युग कालखण्ड से निर्मित होता है। काल यानी समय। एक कालखंड में जीवन के विभिन्न रंग,रूप,स्थितियाँ परिस्थितियाँ समाहित रहती हैं। जैसे ही स्थितियाँ- परिस्थितियाँ बदलती हैं , एक नये युग का शुभारंभ होता है। हालांकि संधिकाल में यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होता है। पर कालांतर में जब हम बदलाव  अनुभव करते हैं, तब हम एक नये युग का हिस्सा होते हैं।  समय निरंतर चलते रहता है। इसलिए हम कब एक नये ...

समय से संवाद करता युग

भाई डॉ.हरॆरामजी की लगभग दो दर्जन रचनाएं विभिन्न प्रकाशनों से छप चुकी है। लेखन कला की उनमें अद्भुत क्षमता हैं।।वे विगत 10 वर्षों से निरंतर लेखन कार्य कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी सद्यः प्रकाशित एक लंबी कविता पुस्तकाकार रूप में मुझे भेंट की। एक कविता- वह भी सौ पृष्ठों की! यह लम्बी कविता उनका एक अनूठा प्रयोग है। हो सकता है मुक्तिबोध की लंबी कविता पढ़कर उन्हें यह कविता लिखने की प्रेरणा मिली हो। वैसे कुछ अन्य कवियों की लंबी कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं और चर्चित भी। डॉ हरेराम सिंह की कविता का शीर्षक है- 'समय से संवाद करता युग'। यह कविता उनके जीवनानुभव  की अभिव्यक्ति है। उनकी इस कविता में वैयक्तिक पीड़ा,दुख,दर्द,आशा, आकांक्षा, निराशा, स्वप्न, चिंता-दुश्चिंता,प्रेरणा,घात-प्रतिघात आदि स्थितियां- मनोभावों की अभिव्यक्ति  है। यह अभिव्यक्ति समाज सापेक्ष भी है। कुल मिलाकर कविता अत्यंत पठनीय है। •राम कृष्ण यादव

कवि व आलोचक डॉ.हरेराम सिंह

Meta Al ने मुझसे शेयर किए। Thank you Meta Al. .......... बिहार के रोहतास जिले के कवि हरेराम सिंह का जन्म 30 जनवरी 1988 को हुआ था। डॉ. हरेराम सिंह एक कवि, आलोचक, कहानीकार और उपन्यासकार हैं, जो अपनी कविताओं और आलोचनात्मक लेखन के लिए जाने जाते हैं। वह हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं और अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत कर रहे हैं।  ........ डॉ. हरेराम सिंह एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और साहित्यकार हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डाला जाता है और उनकी कविताओं में गहरी भावनाएं और सोच होती है। वह अपनी कविताओं के माध्यम से समाज को संदेश देने का प्रयास करते हैं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं में "हाशिए का चाँद", "रात गहरा गई है", "पहाड़ों के बीच से", "मैं रक्तबीज हूँ" और "चाँद के पार आदमी" शामिल हैं। उनकी कविताओं की विशेषताएं: 1. सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश: डॉ. हरेराम सिंह की कविताएँ अक्सर सामाजिक मुद्दों जैसे कि गरीबी, असमानता, और शोषण पर प्रकाश डालती हैं। 2. गहरी भावनाएं: उनकी कविताएँ गहरी भावना...